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perception

जीवन और दुनिया में सत्य और वास्तविकता से ज़्यादा धारणा का महत्व है। Perception plays more important role than reality is this world. धारणा किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में जितना व्यापक प्रभाव डालती है, उतना तो सत्य और वास्तविकता भी नहीं डाल पाते।किसी के बारे में आपके मन और मस्तिष्क में एक बार कोई धारणा घर कर ले तो फिर कितने ही सबूत उस धारणा के खिलाफ पेश कर दो , मन से शंका दूर नहीं हो सकती। अतः आपकी सोच ही महत्वपूर्ण है सत्य नहीं। जैसे अगर प्रेम चोपड़ा किसी फिल्म में अच्छा भी काम कर रहा होता है तो भी देखने वाला कह देता था कि इसमे जरूर इसकी कोई चाल है। वहीं अगर हीरो कोई गंदा काम कर रहा होगा तो इसकी मजबूरी होगी। पर जीवन में कोई ब्लैक या व्हाइट नहीं होता ,सभी ग्रे शेड के होते हैं। आपकी सोच उस ग्रे शेड में  उस व्यक्ति के लिए या तो ब्लैक ढूंढ़ती है या व्हाइट ढूंढ़ती है। इस लिए इस संसार में 100 बार बोला गया झूठ कई बार सच से बड़ा हो जाता है, क्योंकि वो झूठ कई हज़ार लोगो के मन में धारणा का रूप ले चुका होता है।जिसे बदलना आसान नहीं। प्रेम चोपड़ा को अब अरुण गोविल बनने के लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। ...

आज की सीख 4- देव असुर संग्राम में इन्द्र की हार

जब देव और असुर संग्राम में देवता हार गए और असुर विजयी हो गए तो इन्द्र और अन्य देवता मिलकर देवगुरु बृहस्पति के पास गए।तब देवगुरु ने उनसे कहा कि क्या तुमने अपने शासन में अनुसंधान, विज्ञान, चिकित्सा, युद्ध कौशल और उद्यम का विकास हुआ है।क्या तुम्हारे राज्य में धनुर्वेद, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र और स्थापत्य के अच्छे आचार्य हैं? नहीं हैं। हां यह सत्य है कि तुम्हारे राज्य में गंधर्व वेद और कला एवं साहित्य के उत्कृष्ट आचार्य हैं। तुम्हारे शासन में कला और संगीत का खूब सम्मान और विकास हो रहा है किन्तु कला जीवन का उत्कर्ष कर रही है या अपकर्ष।यह जीवन को अच्छा बना रही है कि बुरा बना रही है? जब कलाकार ,कला से बड़ा हो जाए।आयु और स्वास्थ्य देने वाले विज्ञान का अनुसंधान रुक जाए। युद्ध और शांति स्थापित करने में विज्ञान की रुचि कम हो जाए। लोक कल्याण के शास्त्र दम तोड़ने लगे। तो उस शासन की विजय कैसे होगी। धनुर्वेद , आयुर्वेद,गंधर्व वेद और अर्थशास्त्र ये चारो वेदों की शाखाएं हैं। इसलिए ये उपवेद  कहलाते हैं। क्या इन्द्र तुमने नहीं देखा कि असुरो ने युद्ध कला में श्रेष्ठता हासिल कर ली है।उन्होंने विज्ञान और ...

उपनिषद गंगा _संन्यास भाग 2

उपनिषद गंगा     👉सन्यास भाग -2 ------------------    (याज्ञवल्क्य व मेत्रेयि) 1- ज्ञान कभी पराजित नही होता, बल्कि अहंकार पराजित होता है। 2- दूसरो को पराजित करने में श्रेष्ठता नहीं है। श्रेष्ठ वह है जो विनम्र भाव से ज्ञान को जीता हो। 3- शास्त्रार्थ के नाम पर हम एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, बल्कि सही मायने में तो शास्त्रार्थ का अर्थ है एक दूसरे से सीखना ना कि एक दूसरे को हराना। 4- अपने ज्ञान को ही सर्वोपरि मानना व ज्ञान के नाम पर  दूसरे को कम या छोटा आंकना, जाति रंगभेद या फिर वर्ण व्यवस्था के नाम पर दूसरे को ज्ञान द्वारा नीचा दिखाना, ज्ञानी होने पर भी अज्ञानता की प्रदर्शन है। 5- व्यक्ति सत्य से अनभिज्ञ हो तर्क करता है, जब उसका तर्क काम नहीं आता तो फिर कुतर्क करता है, क्या कुतर्क करना सत्य की हिंसा नहीं है। 6- मान्यताओं के बोझ के तले व्यक्ति अपनी बात को सत्य रूपी आवरण पहनाकर ज्ञान का ढोल पिटता रहता है, अपने विवेक का वह मान्यताओं के बोझ के तले गला घोट देता है। 7- जिस सुख को तुम सही मायने में सुख समझते हो वह धन से अर्जित किया हुआ सुख है जो त...

आज की सीख 1

आज की सीख गलत तब तक गलत है जब तक कोई दूसरा करता है।और हम देखते हैं।पर जब हम करते हैं तो हमारा दिल उसके लिए हजार बहाने तैयार कर लेता है और हमारा दिमाग उसके पक्ष में सौ तर्क ढूंढ लेता है।

आज की सीख 3- कर

आज की सीख जिस प्रकार सूर्य, सागर से, नदी से या पोखर से उनकी क्षमता अनुसार जल को भाप के रूप में लेता है जो बादल बनता है( यहां सागर सबसे ज़्यादा और पोखर सबसे कम अपनी अपनी क्षमतानुसार जल देते हैं ) फिर बारिश की बूंदे बनकर पानी को धरती पर समान रूप से बिना भेदभाव के सबको बराबर वापस लौटाता है।उसी प्रकार राजा को सबसे उनकी  आमदनी और क्षमता अनुसार अलग अलग कर लेना चाहिए पर उस कर से उत्पन्न हित कार्यों को सभी जनता में बारिश की बूंदों के समान बिना भेदभाव के उनकी आवश्यकता अनुसार प्रदान करना चाहिए।

राष्ट्रगान के रचनाकार महाकवि टेगौर ने कहा था ..."मैं अपने देश की सेवा करने को तैयार हूँ ....पर उसे पूजने को नही ...देश को पूजना --अलौकिक बना देना -देश को अभिशप्त करने जैसा है ...इसमे गूढ ज्ञान छूपा है ....समझिये इसलिये मेरा मानना है ...भक्ति मे तर्क नही चलता ...असहमती की कोई जगह नही है ....प्रेम मे तर्क है ...इसलिये मैं देशभक्त कि जगह देशप्रेमी हूँ

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*Harivansh Rai Bachhan's poem on FRIENDSHIP :* _________________________________ ....मै यादों का     किस्सा खोलूँ तो,     कुछ दोस्त बहुत     याद आते हैं.... ...मै गुजरे पल को सोचूँ     तो, कुछ दोस्त     बहुत याद आते हैं....   _...अब जाने कौन सी नगरी में,_ _...आबाद हैं जाकर मुद्दत से....😔_ ....मै देर रात तक जागूँ तो ,     कुछ दोस्त      बहुत याद आते हैं.... ....कुछ बातें थीं फूलों जैसी, ....कुछ लहजे खुशबू जैसे थे, ....मै शहर-ए-चमन में टहलूँ तो, ....कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं. _...सबकी जिंदगी बदल गयी,_ _...एक नए सिरे में ढल गयी,_😔 _...किसी को नौकरी से फुरसत नही..._ _...किसी को दोस्तों की जरुरत नही...._😔 _...सारे यार गुम हो गये हैं..._ ...."तू" से "तुम" और "आप" हो गये है.... ....मै गुजरे पल को सोचूँ      तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.... _...धीरे धीरे उम्र कट जाती है..._ _...जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है,_😔 _...कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है..._   _और कभी यादों के सहारे ज़ि...